परिवर्तनशीलता प्रकृति का शास्‍वत नियम है, क्रिया की प्रक्रिया में मानव जीवन का चिरंतन इतिहास अभिव्‍यंजित है।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

दो वक्त की रोटी


दो वक्‍त की रोटी के लिए
इंसान दीवाना बना फिरता है
रब की हर चौखट पर
माथा रगड़ता मिलता है
भाग्‍य चमकाने के लिए
क्‍या-क्‍या नहीं फिर करता है
मन्दिर का तिलक, मस्जिद की भभूति
बाबाओं की दी लोंग-ईलायची
मुँह में दबाए फिरता है
सभी के नियमों को
मन में बसाए फिरता है
भूखा हो खुद मगर
चिडि़यों को दाना, मछली को गोली
मंदिरों में जाकर भंडारा कराए फिरता है
जेब हो खाली मगर, दान दिया करता है
सब करता है, एक उम्‍मीद लिए
नसीब मेरा चमक जाएगा
एक दिन तो भाग्‍य मेरा
उज्‍ज्‍वल ही बन जाएगा।
इन सबके बाद भी जब
काम नहीं बनते उसके
दिल टूट जाता है
उम्‍मीद भी छूट जाती है
हाथ में बस मेहनत
सिर्फ मेहनत ही रह जाती है
टोने-टोटके से काम नहीं बनते यारो
ये तो एक भ्रम है जो सपने बड़े दिखलाता है
मेहनत ही एक सच है, जो राह हमें दिखलाता है
मेहनत कर सिर्फ मेहनत कर
एक दिन तेरा काम ही रंग लाएगा
जिसे ढूंढता है मंदिर-मस्जिद में
वो तेरे भीतर ही मिल जाएगा
तेरी किस्‍मत का बंद ताला
एक दिन खुल जाएगा।

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