परिवर्तनशीलता प्रकृति का शास्‍वत नियम है, क्रिया की प्रक्रिया में मानव जीवन का चिरंतन इतिहास अभिव्‍यंजित है।

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

जिंदगी के रंग



कवियत्री : निर्मल राज

जीवन भर कठिनाइयों के पहाड़
और दुख के सागर लाँघ कर
वह अंत तक -
सारी चिंता मुक्‍त, बच्‍चों की खातिर
अपने ही भीतर बहती गमों की लहरें
थाम लेती हैं डूबने से पहले ही
जरा सी बची हुई मुस्‍कान।
वाह रे! जीवन, जिंदगी जीने के
कितने उसूल, कितने अंदाज
ऐ जिंदगी, अब तू ही बता जीने के ढंग
किस तरह से जिएँ जिंदगी
किस डगर की ओर चलें
किस राह पर जाकर हम
किस कोने में मशाल जलाएँ
ऐ जिंदगी, तेरी भी क्‍या लीला है
जीवन जीने के लिए कितने बँटवारे
कितने टुकड़ों में बाँट कर
दिल और दिमाग को न्‍यारा किया
उमंग-तरंगों की चाहत मिली
स्‍वांसों में लहरों की सौगात मिली
कुसुम, सुमन-सा जीवन खिला था
लेकिन गम और खुशियों में
सिमट गई दोहरी जिंदगी।
आखिर कब तक जिएँ हम
यह उधार की जिदंगी।
ऐ जिंदगी, हम भी
धीरज का आसरा लेकर
बच्‍चों की कतार बाँध
बढ़ते चले जाएंगे -
वो रंगों की टोली
जो बिखरे रंग होली के
बचे हुए रंगों की पोटली बनाकर
आकाश के ताक पर रख दी
पिछली दिपावली के
बचे हुए दीयों में डबडबाया अँधेरा
उलझन भरी इस जिंदगी में
अब उजाला जगमगाएगा
जीवन की इस रणभूमि में।

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