परिवर्तनशीलता प्रकृति का शास्‍वत नियम है, क्रिया की प्रक्रिया में मानव जीवन का चिरंतन इतिहास अभिव्‍यंजित है।

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

मैट्रो का सफर


मैट्रो का निर्माण हुआ है
देखें कितना सुधार हुआ है
बसों की भीड़ न हो पाई कम
देखों चिल्‍लम-चिल्‍ली हरदम।

मैट्रो में भी भीड़ है भारी
मचा रही कितना हड़कंप
उतरने वाले उतर न पाएं
चढ़ने वाले बल आजमाएं
किसी की देखो बटन टूट गई
बैग किसी से खींचा न जाए
चश्‍मा टूटा, घड़ी उतर गई
भीड़ है कितनी, समझ न आए।

भीड़ में देखो जेब कट गई
बटुआ खोया वो चिल्‍लाए
घुम-घुमकर शोर मचाए
जाने किसने लिया चुराए
मिलेगा कैसे कौन बताए
भीड़ बहुत है भारी-भरकम
सबकी नीयत कौन बताए
रोने से अब कुछ न मिलेगा
अपने मन को लो समझाए
चोर तो अब न पकड़ा जाए
ध्‍यान रखो खुद अपना भाई
ये तो है मेहनत की कमाई।

मैट्रो में जो भी है चढ़ता
अपनी तरह उनको समझो तुम
नारी का भी सम्‍मान करो तुम
ना बल पर अभिमान करो तुम
बड़े-बुजुर्गों का ध्‍यान रखो तुम
दो-दो मिनट पर मैट्रो है आती
मंजिल तक सबको पहुंचाती
धीरज तुम अपना क्‍यों खोते
कष्‍ट किसी को क्‍यों हो देते।
थोड़ा सा संयम बरतो तुम
सफर सरल अपना कर लो तुम।

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बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

तो सोचता हूं -


जब देखता हूं भूखे-नंगे
चिथड़ों में लिपटे बच्‍चों को
भीख मांगते हुए फटकार खाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं -
बच्चियों से बलात्‍कार करते
उनका बचपन रौंधते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं -
लड़के की चाह में
भ्रूण हत्‍या करवाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं जायदाद के लिए
भाई को भाई का खून बहाते हुए
मां-बाप को दर-बदर ठोकरें खाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं घर में बहु-बेटियों पर
लोगों को अत्‍याचार करते हुए
दहेज के लिए जिंदा जलाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं डिग्री लिए युवाओं को
नौकरी के लिए गिड़गिड़ाते हुए
अफसरों को रिश्‍वत खिलाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं
भूख से तड़पते गरीब बच्‍चों और बूढ़ों को
पार्टियों में लोगों को खाना फेंकते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं बेघर लोगों को
सड़कों की पटरियों पर सोते हुए
कई लोगों को बिल्डिंगें बनवाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

तो अब मैं पूछता हूं उन लोगों से
सिवाए अपने तुम्हें कोई इंसान नजर आता है
अब तो जागो दोस्‍तों...
इंसान खाली हाथ आया था, खाली हाथ जाता है।

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मंगलवार, 4 अक्तूबर 2016

पलभर की सांस

यह कविता उस बच्‍ची को समर्पित है, जो पैदा होते ही मृत्‍यु की गोद में समा गई।

कवियत्री : निर्मल राज

नौ महीने कोख में रखकर
दर्द से सिंचा था मैंने
एक नन्‍हीं सी पौध बनकर
उगेगी आंगन मेरे
खिलेगी शबनम की तरह
महकेगी गुल-बहार बनकर
गूँजेगी किलकारियाँ तेरी
मीठी-मीठी धुन में
चिडि़याँ गाएँगी गीत खुशी के
बस तेरे आने के इंतजार में
वो वक्‍त भी आ गया
स्‍पर्श किया माँ की गोद को
जैसे आसमान से उतरी
परियों की रानी थी तू
न मैंने जी-भर देखा
न ही जी-भर प्‍यार किया
आते ही क्‍यों रूठ गई
अग्‍नी में सिमट गईं
जल की जलपरी बन
रूलाती हुई चली गई
मखमल की तरह कोमल थी
रूई के जैसे हल्‍की-फुल्‍की
गौरी-निर्मल कंचन काया
तेरा ये राज लाड़ली-
कुछ भी समझ न आया
जीवन मिला, जुदाई हुई
एक पल में तेरी विदाई हुई
क्‍यों मेरी बच्‍ची
केवल एक सांस की खातिर
एक ही पल के लिए तूने
हमें माँ-बाप का अहसास दिया
दादा-दादी, ताऊ-ताई
नाना-नानी, मामा-मामी
सब परिवार तेरा अपना था
फिर क्‍यों डर गई जीनेे से
जो देखें हमने मिलकर सपने
सब तेरी एक सांस में सिमट गए
फिर से लौट आना मेरी लाड़ली
तेरे आने का इंतजार
पहले भी था, अब भी है, और हमेशा रहेगा...

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