परिवर्तनशीलता प्रकृति का शास्‍वत नियम है, क्रिया की प्रक्रिया में मानव जीवन का चिरंतन इतिहास अभिव्‍यंजित है।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

स्‍त्री-विमर्श



लेखिका : निर्मल राज

औरतों की स्थिति को लेकर कई सवाल मेरे दिमाग में घूमते रहते हैं। परिवार की मान-मर्यादा, शिष्‍टता की सीमा रेखा लड़कियों को ही क्‍यों समझाई जाती हैं? सुरक्षा के घेरे में वही जिंदगी क्‍यों गुजारें? क्‍यों सारे व्रत-उपवास, नियम-धर्म औरतों के जिम्‍मे सौंप दिए जाते हैं? ये सारे सवाल मुझे कुरेदते रहते हैं। मेरे मन के अंदर इसके विरोध का गुबार बढ़ता गया। मैंने सोच लिया कि सबसे पहले अपने आपको इन परिस्थितियों से बाहर निकालना होगा, जिससे आने वाले समय में औरतों का अपमान न हो।
     लड़की अपने जन्‍म से लेकर अंत तक संघर्ष में ही जीती रहती है। एक काम तो ईश्‍वर ने बहुत अच्‍छा किया है कि औरत बनाने के साथ-साथ गुण, संस्‍कार, शांति, संघर्ष और दुख के आँसू भी अपने अंदर समेटने की शक्ति केवल इन्‍हीं को ही प्रदान की। जैसे नदी की लहरें किनारे से बाहर निकलने की कोशिश करती हैं, पर नदी का इतना बड़ा हृदय है कि पानी की लहर को किनारे से बाहर निकलने ही नहीं देती बल्कि आनेवाले तूफान को अपने अंदर ही रोक लेती है। इसी तरह औरतों का हृदय भी इतना विशाल है फिर चाहे कितना बड़ा दुख हो, सबको अपने अंदर समेटकर फिर जिंदा हो जाती हैं। मानो कुछ हुआ ही नहीं...। वे अपने आँसुओं की बहती धारा को अपने अंदर ही समो लेती हैं, चाँद की चाँदनी की शांत किरणों की तरह। इसलिए औरत चाहे वह किसी की बेटी, बहू, बहन या माँ हो, सभी परिस्थितियों का सामना करके अपनी इच्‍छाओं को हृदय के हवन में सामग्री बनाकर स्‍वाहा कर देती है। वह अपने कीमती आँसू गंगाजल समझकर शुद्ध वातावरण करने के लिए पवित्र जल से धो डालती है।
     इतना सब करने के बाद भी औरतों को कितना कुछ सुनने को मिलता है? घर में यदि कोई नुकसान हो जाए तो लोग औरत पर ही चिल्‍लाना शुरू कर देते हैं। और तो और न जाने किन-किन शब्‍दों की वर्णमाला चुन-चुनकर सुनाते हैं। जैसे कुल्‍टा, बिनाअक्‍ल की, बदनसीब, कर्मजली, चुड़ैल, डायन, निक्‍कमी कुल का नाश करके ही रहेगी। और तो और उसके मायके तक को भी नहीं छोड़ते, उनको भी अपमान के घेरे में जकड़ लेते हैं। शादी के बाद तो औरत और भी अपने आँचल को समेटकर घूँघट की लाज, हाथों में चूडि़याँ, पाँव में पायल के साथ दो परिवारों की आन और शान रखने के लिए सबकुछ सहकर अपने आपको जिंदा रखती है।
जिन मान्‍यताओं-परंपराओं के अनेक गुण भरे हुए हैं, उनकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे उनके स्‍वभाव का अंग बन चुकी हैं। इनके निर्माण में औरत का भी समाज के समान योग है। लेकिन जब विपरीत परिस्थितियों में आदर्श परंपराओं को निभाती हुई औरत आत्‍मविश्‍वास और कुशलता के साथ शक्तिशाली बनकर श्रेष्‍ठ पथ की ओर बढ़ती जाएगी, तब उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा।

माँ तुम देना जन्‍म मुझको, मिटा दूँगी अँधियारा,
श्रेष्‍ठ पथ पर चलकर, कर दूँगी उजियारा।

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