परिवर्तनशीलता प्रकृति का शास्‍वत नियम है, क्रिया की प्रक्रिया में मानव जीवन का चिरंतन इतिहास अभिव्‍यंजित है।

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

दीया जो बुझ गया

(पिता को समर्पित)

कवियत्री : निर्मल राज

रक्षाबंधन के लिए
आया था एक फोन
तेरह अगस्‍त 2016 को
पिता का आखिरी फोन
रक्षाबंधन के लिए
बंधन के धागे
जोड़ने के लिए
संदेश आया
लेकिन क्‍या पता
रक्षाबंधन के धागे
इतने कच्‍चे निकलेंगे
बाँधने से पहले ही
टूटकर बिखर जाएँगे।

अक्‍सर कहा करते थे
बेटियाँ बहुमूल्‍य रत्‍न हैं
जिसका कोई मोल नहीं
लेकिन पराए घर की
धरोहर हैं मेरे पास।

बचपन में जिस पिता ने
गोद में खिलाया-सहलाया
सीप में मोती की तरह
संजोकर बेटियों को रखा
कहीं चुरा न ले कोई
उन मोतियों को।

लेकिन, आज वो घड़ी भी आई
वर्षों से था इंतजार
जो सपने संजोए थे मैंने
लाड़लियों के लिए दिल में
जगाए थे अरमान हृदय में
अब पूरे करने का समय आ गया
बैठा दिया डोली में
करके काम सब अपने पूरे।
छोड़ चले अब हमको अधूरे
जिस पिता का साया था सिर पे
आज उठ गया
जहाँ से आए थे वहीं
छोड़ चले अपने देश
लंबी यात्रा करके थक गए
सो गए गहरी नींद में
चैन की साँस मिली
आराम ही आराम
जीवन में
जिंदगी में थी उलझनें
उलझन के धागे
उलझन भरे रिश्‍ते-नाते
एक ही झटके से तोड़ चले
ये कच्‍चे-पक्‍के घर मकान
खेत-खलिहान, बाग-बगीचे
सब छोड़ दिए
पीछे कोसो दूर
गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ
ये सूनी सड़कें सब रह गई यहीं
ये रीति-रिवाज, तीज-त्‍योहार
पत्‍नी, बेटों का साथ
होली के रंगों की
वो दोस्‍तों की टोली
अब सब अधूरे हैं
बिन आपके
दीवाली के वो दिन याद हैं
लाते थे खिल-बताशे, मिठाइयाँ
थैला भर सामान
वो दीए भी अब
दीपक के प्रकाश के बिन
अधूरे रह गए
फैला था चहूँ ओर उजाला
दीए वो सिमट जाएँगे अब
घर-आँगन की दीवारों में
अब उजालों से घबराते हैं हम
दूर कहीं न जा पाएँगे हम।

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