परिवर्तनशीलता प्रकृति का शास्‍वत नियम है, क्रिया की प्रक्रिया में मानव जीवन का चिरंतन इतिहास अभिव्‍यंजित है।

शनिवार, 24 सितंबर 2016

आज तो है



कवियत्री : निर्मल राज

कल ना हमारा है
ना किसी और का
कल तो सिर्फ
अपना है
जो जीता है
अपने लिए बड़ी शान से
जो आज है
जीवन का एक दिन
वो दिन हमारा है
जीयो आज
सीना तानकर
दुख की परछाई
डूब गई अपने ही भीतर
जो फैला रखा था
चहूँ ओर काला साया
बड़ी दूर तक
नहीं छोड़ा उसने
कल के इंतजार में
लेकिन कल का पता नहीं
आज तो है।

एक नई रोशनी भरी
नमी किरण मन को लूभा गई
हर्षित मन धीरे से मुस्‍कुराकर कह उठा
नन्‍हीं-नन्‍हीं टिम-टिमाती
उजली किरन नमन तुम्‍हें
जीने की चाहत की
उमंग जगा कर
भिन्‍न-भिन्‍न रंगों से सजाया वातावरण
जिन्‍दगियाँ खिल-खिल
लहरों में बहने लगी
उजड़े चमन बाग-वान हुए
जियो आज हँसी-खुशी के साथ
आज दिन हमारा है
कल किसी और का...।

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शनिवार, 17 सितंबर 2016

हिंदी बचाओ


अंग्रेजों की गुलामी से तो
देश ये आजाद हुआ
अंग्रेजी की गुलामी कर
हिंदी को गुलाम हम बना रहे।

गोरे तो चले गए
अपनी रीतियों को छोड़कर
सभ्‍यता अपनी
पाकर भी हम भुला रहे।

अंग्रेजों की अंग्रेजी
कमाल बड़ा कर रही
हम लोग हिंदी क्‍यों
हाशिए पर पहुंचा रहे।

बच्‍चे आज के
अंग्रेजी बोलने में चुस्‍त हैं
हिंदी भाषा बोलने में
वे तो शरमा रहे।

पापा को वो बोले डैड
माँ को वो बोले मोम
पापा को वो डेड देखो
माँ को नॉन लिविंग बना रहे।

हिंदी भाषा सीखने को
विदेशी यहां आ रहे
अपने ही देशवासी
हिंदी से क्‍यों कतरा रहे।

सभी अभिभावकों से विनती है यह मेरी
गुलामी की अब सभी जंजीरें तोड़ दो
खुद भी तुम हिंदी भाषा बोलो और
बच्‍चों को हिंदी भाषा का तुम ज्ञान दो।

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शनिवार, 10 सितंबर 2016

कर्म का चक्‍कर


जो होना है वो होता है
फिर तू क्‍यों बंदे रोता है
इस बात से ये न समझ लेना
जो तू कर्म करे वो धोखा है
जब तक है प्राण तेरे तन में
तुझको तो कर्म ही करना है
वो अच्‍छा हुआ या हुआ बुरा
तुझको तो उसमें ही ढलना है
अच्‍छे दिन जो तेरे आएं
कुछ अच्‍छे कर्म तेरे होंगे
जब बुरे दिन तेरे आएं
वो बुरे कर्म तेरे होंगे
गर, दोनों मिलकर साथ चलें
तो कर्म पिछले जनम के होंगे
ऐसे ही सुख-दुख अपनाए जा
जीवन ऐसे ही बिताए जा
जो होना है वो होता है
फिर तू क्‍यों बंदे रोता है।

इस कर्म के चक्‍कर में बंदे
तू मेहनत से न घबराना
ये भी तो तेरा कर्म ही है
मेहनत करना और फल पाना
जीवन की दुख तकलीफों को
जो तू हंसकर पार लगाएगा
ये कर्म तेरा सबसे उज्‍ज्‍वल
तेरी कश्‍ती को पार लगाएगा
जीवन की इस रणभूमि में
तू एक सफल योद्धा कहलाएगा।
जो होना है वो होता है
फिर तू क्‍यों बंदे रोता है।

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शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

स्‍त्री-विमर्श



लेखिका : निर्मल राज

औरतों की स्थिति को लेकर कई सवाल मेरे दिमाग में घूमते रहते हैं। परिवार की मान-मर्यादा, शिष्‍टता की सीमा रेखा लड़कियों को ही क्‍यों समझाई जाती हैं? सुरक्षा के घेरे में वही जिंदगी क्‍यों गुजारें? क्‍यों सारे व्रत-उपवास, नियम-धर्म औरतों के जिम्‍मे सौंप दिए जाते हैं? ये सारे सवाल मुझे कुरेदते रहते हैं। मेरे मन के अंदर इसके विरोध का गुबार बढ़ता गया। मैंने सोच लिया कि सबसे पहले अपने आपको इन परिस्थितियों से बाहर निकालना होगा, जिससे आने वाले समय में औरतों का अपमान न हो।
     लड़की अपने जन्‍म से लेकर अंत तक संघर्ष में ही जीती रहती है। एक काम तो ईश्‍वर ने बहुत अच्‍छा किया है कि औरत बनाने के साथ-साथ गुण, संस्‍कार, शांति, संघर्ष और दुख के आँसू भी अपने अंदर समेटने की शक्ति केवल इन्‍हीं को ही प्रदान की। जैसे नदी की लहरें किनारे से बाहर निकलने की कोशिश करती हैं, पर नदी का इतना बड़ा हृदय है कि पानी की लहर को किनारे से बाहर निकलने ही नहीं देती बल्कि आनेवाले तूफान को अपने अंदर ही रोक लेती है। इसी तरह औरतों का हृदय भी इतना विशाल है फिर चाहे कितना बड़ा दुख हो, सबको अपने अंदर समेटकर फिर जिंदा हो जाती हैं। मानो कुछ हुआ ही नहीं...। वे अपने आँसुओं की बहती धारा को अपने अंदर ही समो लेती हैं, चाँद की चाँदनी की शांत किरणों की तरह। इसलिए औरत चाहे वह किसी की बेटी, बहू, बहन या माँ हो, सभी परिस्थितियों का सामना करके अपनी इच्‍छाओं को हृदय के हवन में सामग्री बनाकर स्‍वाहा कर देती है। वह अपने कीमती आँसू गंगाजल समझकर शुद्ध वातावरण करने के लिए पवित्र जल से धो डालती है।
     इतना सब करने के बाद भी औरतों को कितना कुछ सुनने को मिलता है? घर में यदि कोई नुकसान हो जाए तो लोग औरत पर ही चिल्‍लाना शुरू कर देते हैं। और तो और न जाने किन-किन शब्‍दों की वर्णमाला चुन-चुनकर सुनाते हैं। जैसे कुल्‍टा, बिनाअक्‍ल की, बदनसीब, कर्मजली, चुड़ैल, डायन, निक्‍कमी कुल का नाश करके ही रहेगी। और तो और उसके मायके तक को भी नहीं छोड़ते, उनको भी अपमान के घेरे में जकड़ लेते हैं। शादी के बाद तो औरत और भी अपने आँचल को समेटकर घूँघट की लाज, हाथों में चूडि़याँ, पाँव में पायल के साथ दो परिवारों की आन और शान रखने के लिए सबकुछ सहकर अपने आपको जिंदा रखती है।
जिन मान्‍यताओं-परंपराओं के अनेक गुण भरे हुए हैं, उनकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे उनके स्‍वभाव का अंग बन चुकी हैं। इनके निर्माण में औरत का भी समाज के समान योग है। लेकिन जब विपरीत परिस्थितियों में आदर्श परंपराओं को निभाती हुई औरत आत्‍मविश्‍वास और कुशलता के साथ शक्तिशाली बनकर श्रेष्‍ठ पथ की ओर बढ़ती जाएगी, तब उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा।

माँ तुम देना जन्‍म मुझको, मिटा दूँगी अँधियारा,
श्रेष्‍ठ पथ पर चलकर, कर दूँगी उजियारा।

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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

बेटियाँ


कवियत्री : निर्मल राज

गुडि़या, खिलौने, चॉकलेट, टॉफी
सब कहाँ हैं माँ?
अब मैं क्‍यों नहीं खेल सकती
क्‍या?
मैं कभी नहीं खेलूँगी
चुप क्‍यों हो माँ?
मेरा कसूर ही क्‍या है?
जो खेल नहीं सकती खिलौने से
मैं समझ गई माँ आपकी पीड़ा
मेरा बचपन छिन गया
जैसे चिडि़या चली गई कोसों दूर
अपना देश छोड़कर
जो उनकी चहचाहट से
गूँजता था घर-आँगन
खेत खलिहान
मीठी-मीठी धुन में गुन-गुनाना
मन को हर्षित कर देती
कहती थी हमसे चीं-चीं करके कि
एक दिन शिकारी आएगा
खा जाएगा मुझे और मेरे वंश को
मार डालेगा एक-एक करके
मिटा देगा मेरा
कुल का नामो-निशान
लेकिन मैं फिर आऊँगी
इस जग-संसार में जीने के लिए
अपना वंश बढ़ाने की खातिर
लड़ूँगी अपने खातिर ताकि
मारी न जाऊँ
उस शिकारी के हाथों से
जिन्‍दा रहूँगी हक से
माँ, मुझे भी जीना है
गौरैया की भाँति
अपने बचपन में खेलने की
उम्र की खातिर...
लड़ूँगी मैं उन भेडि़यों से
शिकारियों से...
जो छीन लेते हैं मासूमों का जीवन
माँ, मैं लड़ूँगी
वीरता और साहस के साथ
सिर उठाकर
अपनी गरिमा को बढ़ाकर
ताकि छिन न जाए
हमारा बचपन
हम भी बेटियाँ हैं, भारत देश की
हमें भी जीने का हक है
अपने मान-सम्‍मान के साथ।

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सोमवार, 5 सितंबर 2016

प्‍यारा सा बचपन

यह मेरे बचपन का छायाचित्र है।

न झूठ न फरेब
न ही कोई धोखा
ऐसा होता है
यह प्‍यारा सा बचपन
वो पल में रूठना
पल में ही मान जाना
अपनी शर्तो को
चुटकियों में मनवाना
याद आता है मुझको
वो बचपन सुहाना
कोई चिंता न थी
न थी कोई फिकर
वो वर्षा के पानी को
देखकर ललचाना
मां से बचकर
झूम-झूमकर नहाना
कागज की नाव बना
फिर उसमें दौड़ाना
याद आता है मुझको
वो बचपन सुहाना
मित्रों की संगत में
खेलते थे ऐसे
ना खाने की फिकर थी
न पीने की चिंता
जिंदगी हसीन थी                 
वो दुनिया रंगीन थी
सपनों का आसमां था
कल्‍पनाओं की जमीन थी
याद आता है मुझको
वो बचपन सुहाना
काश! लौट फिर आता
वो बचपन सुहाना
वो बचपन सुहाना!!

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शनिवार, 3 सितंबर 2016

बेटियों का वजूद

यह मेरी बेटी का छायाचित्र है।

सरकारी अस्‍पताल में जब
माँ ने बच्‍चे को जन्‍म दिया
उसने देखा
उसकी कोख से
बेटी ने जन्‍म लिया
उसे अपने भाग्‍य पर
विश्‍वास न हुआ
उसने अपने भाग्‍य को
रोकर कोसना शुरू किया
हे भगवान मेरे भाग्‍य में
बेटी ही लिखी थी क्‍या
बाहर तो सब बेटे की
आस लगाए बैठे हैं
क्‍या कहुँगी मैं सबसे
मैंने बेटी को जन्‍म दिया
शर्म से मेरी निगाहें
अब उठ नहीं पाएँगी
सास-ससुर पति के आगे
मेरी साँसें भी रूक जाएँगी
तभी एक नर्स ने आकर
मुझे झकझोर दिया
बोली, क्‍या हुआ अरे पगली
क्‍या तू एक बेटी नहीं
क्‍या मैं किसी की बेटी नहीं
अगर हमारे माँ-बाप भी
इसी तरह आँसू बहाते तो
हमारे वजूद भी आज
बताओ कैसे मिल पाते
बेटियों को समाज ने
एक श्राप बना रखा है
जबकि बेटियों ने तो
दो परिवारों में
दिया जलाए रखा है
सम्‍मान बनाए रखा है
अरे पगली
इतना मत रो अपने भाग्‍य पर
तेरा भाग्‍य तो भगवान ने
बहुत रच के बनाया है
तुझे बेटी देकर
तेरा गौरव बढ़ाया है
इतना सुनकर उसने
अपने आँसू पोंछ डाले
बेटी को गले लगाया
और अपना दूध पिलाया
जैसे ही बेटी का
माँ से स्‍पर्श हुआ
माँ ने बेटी से
तभी यह वादा किया
मेरी बच्‍ची तुझसे दुर्व्‍यवहार
न करने दूँगी किसी को
अब न रोऊँगी मैं खुद
न रोने दूँगी तुम्‍हीं को
मित्रों गर जो बेटी
जन्‍म ले आपके घर
तो आँसू न बहाना
सर का बोझ समझकर
न उसको ठुकराना
बेटी को गले लगाकर
उसका सम्‍मान बढ़ाना।

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गुरुवार, 1 सितंबर 2016

दीया जो बुझ गया

(पिता को समर्पित)

कवियत्री : निर्मल राज

रक्षाबंधन के लिए
आया था एक फोन
तेरह अगस्‍त 2016 को
पिता का आखिरी फोन
रक्षाबंधन के लिए
बंधन के धागे
जोड़ने के लिए
संदेश आया
लेकिन क्‍या पता
रक्षाबंधन के धागे
इतने कच्‍चे निकलेंगे
बाँधने से पहले ही
टूटकर बिखर जाएँगे।

अक्‍सर कहा करते थे
बेटियाँ बहुमूल्‍य रत्‍न हैं
जिसका कोई मोल नहीं
लेकिन पराए घर की
धरोहर हैं मेरे पास।

बचपन में जिस पिता ने
गोद में खिलाया-सहलाया
सीप में मोती की तरह
संजोकर बेटियों को रखा
कहीं चुरा न ले कोई
उन मोतियों को।

लेकिन, आज वो घड़ी भी आई
वर्षों से था इंतजार
जो सपने संजोए थे मैंने
लाड़लियों के लिए दिल में
जगाए थे अरमान हृदय में
अब पूरे करने का समय आ गया
बैठा दिया डोली में
करके काम सब अपने पूरे।
छोड़ चले अब हमको अधूरे
जिस पिता का साया था सिर पे
आज उठ गया
जहाँ से आए थे वहीं
छोड़ चले अपने देश
लंबी यात्रा करके थक गए
सो गए गहरी नींद में
चैन की साँस मिली
आराम ही आराम
जीवन में
जिंदगी में थी उलझनें
उलझन के धागे
उलझन भरे रिश्‍ते-नाते
एक ही झटके से तोड़ चले
ये कच्‍चे-पक्‍के घर मकान
खेत-खलिहान, बाग-बगीचे
सब छोड़ दिए
पीछे कोसो दूर
गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ
ये सूनी सड़कें सब रह गई यहीं
ये रीति-रिवाज, तीज-त्‍योहार
पत्‍नी, बेटों का साथ
होली के रंगों की
वो दोस्‍तों की टोली
अब सब अधूरे हैं
बिन आपके
दीवाली के वो दिन याद हैं
लाते थे खिल-बताशे, मिठाइयाँ
थैला भर सामान
वो दीए भी अब
दीपक के प्रकाश के बिन
अधूरे रह गए
फैला था चहूँ ओर उजाला
दीए वो सिमट जाएँगे अब
घर-आँगन की दीवारों में
अब उजालों से घबराते हैं हम
दूर कहीं न जा पाएँगे हम।

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