परिवर्तनशीलता प्रकृति का शास्‍वत नियम है, क्रिया की प्रक्रिया में मानव जीवन का चिरंतन इतिहास अभिव्‍यंजित है।

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

मरी हुई आत्माएँ













आज के इंसान का जमीर इतना गिर गया
खुद तो जिंदा है मगर, अंतरात्‍मा से मर गया
शिक्षा-विद्या में बहुत, आगे वो बढ़ता ही गया
मगर, दहेज जैसे पाप को आज भी ढोता गया।

अपनी बेटियाँ उसे लगती बड़ी प्‍यारी मगर
दूसरे की बेटियों को देखकर ललचा रहा
नौजवा घर में बैठकर डिग्रियाँ गिनता रहा
पैसों के जोर पर, वो नौकरियां लगवा रहा।

आज के इंसान का जमीर इतना गिर गया।
खुद तो जिंदा है मगर, अंतरात्‍मा से मर गया।।

जिस माँ ने उसको पैदा किया, उसको गाली दे रहा
जिस पिता ने काबिल किया, उसको भी धक्‍का दे रहा
दो वक्‍त की रोटी जो, माँ-बाप को खिला दी अगर
उस रोटी का हिसाब भी गिन-गिनकर वो ले रहा।

आज के इंसान का जमीर इतना गिर गया।
खुद तो जिंदा है मगर, अंतरात्‍मा से मर गया।।

चलना सिखाया पिता ने जिसका हाथ पकड़कर
अच्‍छा बुरा सभी बतलाया, संस्‍कारों का पाठ पढ़ाकर
पिता की आँखों में हैं आंसु, यह व्‍यवहार देखकर
बेटे ने ही आज घर से, बाहर किया धकेलकर।

आज के इंसान का जमीर इतना गिर गया।
खुद तो जिंदा है मगर, अंतरात्‍मा से मर गया।।

बुरा न मानो दोस्‍तो, यदि शुरुआत कर लें बेफिकर
इन बुराइयों को समाज की, दूर कर दें हम अगर
इंसान को भगवान का मतलब समझ आ जाएगा
सोच होगी नई हमारी, एक नया परिर्वतन आएगा।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. अंतरात्मा अभी भी जिन्दा है कुछ लोगों की, तभी तो समाज...

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    1. मैं आपकी बात से बिल्‍कुल सहमत हूं सर। क्‍योंकि यदि आज भी अच्‍छे लोग नहीं होते तो यह संसार गर्त में पहुंच जाता। अभी भी बहुत लोगों की इंसानियत जिंदा है। कविता पढ़कर टिप्‍पणी करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार।

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