परिवर्तनशीलता प्रकृति का शास्‍वत नियम है, क्रिया की प्रक्रिया में मानव जीवन का चिरंतन इतिहास अभिव्‍यंजित है।

रविवार, 14 अगस्त 2016

कहां गइला रजऊ

(शहीदों को श्रद्धांजलि)




जिन्‍दगी बेहाल भइल, कहां गइला रजऊ1
छिप गइला जाके कहां, अइला नाही रजऊ
तू त कहत रहला, जिन्‍दगी भर साथ बा
छोड़ के तू चल गइला, का भइल रजऊ
जिन्‍दगी बेहाल भइल, कहां गइला रजऊ।

ना भावे चूड़ी हमके, ना भावे टिकुली2
ना ही अच्‍छी लागे रतियां3, ना ही चंदनिया4
दिल में कसक उठे, ख्‍वाब भइला रजऊ
छोड़ के तू चल गइला, का भइल रजऊ
जिन्‍दगी बेहाल भइल, कहां गइला रजऊ।

खेतवा में लागे न मन, गांव जवरिया5
सूनी-सूनी लागे हमके सगरी डहरिया6
दुनिया बेकार भइल, तोहरे बिना रजऊ
छोड़ के तू चल गइला, का भइल रजऊ
जिन्‍दगी बेहाल भइल, कहां गइला रजऊ।

न भावे चूल्‍हा हमके, न भावे चौउका7
न भूख प्‍यास लागे, नाही लागे निंदिया
तड़फे मछरिया8 जैसे, जल बिन रजऊ
छोड़ के तू चल गइला, का भइल रजऊ
जिन्‍दगी बेहाल भइल, कहां गइला रजऊ।

केकरा9 से दूख आपन, कहीं हम रजऊ
सब जग उदास भइल, तोहरे बिना रजऊ
कैसे बिताईं जिन्‍दगी, तोहरे बिना रजऊ
छोड़ के तू चल गइला, का भइल रजऊ
जिन्‍दगी बेहाल भइल, कहां गइला रजऊ।

आवे का वादा करके, गइल रहला रजऊ
अपने देस की खातिर, शहीद भइला रजऊ
अब न कोई भेजी हमके, चिट्ठी-पतरिया
छोड़ के तू चल गइला, का भइल रजऊ
जिन्‍दगी बेहाल भइल, कहां गइला रजऊ।।

(1. रजऊ = प्‍यार से पति को कहते हैं, 2. बिंदी, 3. रात, 4. चांदनी, 5. इलाका, 6. रास्‍ता,       7. रसोई, 8. मछली, 9. किस से।)

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