परिवर्तनशीलता प्रकृति का शास्‍वत नियम है, क्रिया की प्रक्रिया में मानव जीवन का चिरंतन इतिहास अभिव्‍यंजित है।

गुरुवार, 9 मार्च 2017

सिंड्रेला और इसका एडवेंचर (बच्चों द्वारा निर्मित लघु फिल्म)

कृपया इन बच्‍चों द्वारा निर्मित फिल्‍म को लाईक एवं इस पर टिप्‍पणी अवश्‍य करें।


निर्देशन : अरमान
निर्माता : श्री अवधेश और श्री विजय
राजकुमारी सिंड्रेला : सोनल (बड़ी), अदिति (छोटी)
राजकुमार : आदित्य

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

दो वक्त की रोटी


दो वक्‍त की रोटी के लिए
इंसान दीवाना बना फिरता है
रब की हर चौखट पर
माथा रगड़ता मिलता है
भाग्‍य चमकाने के लिए
क्‍या-क्‍या नहीं फिर करता है
मन्दिर का तिलक, मस्जिद की भभूति
बाबाओं की दी लोंग-ईलायची
मुँह में दबाए फिरता है
सभी के नियमों को
मन में बसाए फिरता है
भूखा हो खुद मगर
चिडि़यों को दाना, मछली को गोली
मंदिरों में जाकर भंडारा कराए फिरता है
जेब हो खाली मगर, दान दिया करता है
सब करता है, एक उम्‍मीद लिए
नसीब मेरा चमक जाएगा
एक दिन तो भाग्‍य मेरा
उज्‍ज्‍वल ही बन जाएगा।
इन सबके बाद भी जब
काम नहीं बनते उसके
दिल टूट जाता है
उम्‍मीद भी छूट जाती है
हाथ में बस मेहनत
सिर्फ मेहनत ही रह जाती है
टोने-टोटके से काम नहीं बनते यारो
ये तो एक भ्रम है जो सपने बड़े दिखलाता है
मेहनत ही एक सच है, जो राह हमें दिखलाता है
मेहनत कर सिर्फ मेहनत कर
एक दिन तेरा काम ही रंग लाएगा
जिसे ढूंढता है मंदिर-मस्जिद में
वो तेरे भीतर ही मिल जाएगा
तेरी किस्‍मत का बंद ताला
एक दिन खुल जाएगा।

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मंगलवार, 17 जनवरी 2017

जिंदगी के रंग



कवियत्री : निर्मल राज

जीवन भर कठिनाइयों के पहाड़
और दुख के सागर लाँघ कर
वह अंत तक -
सारी चिंता मुक्‍त, बच्‍चों की खातिर
अपने ही भीतर बहती गमों की लहरें
थाम लेती हैं डूबने से पहले ही
जरा सी बची हुई मुस्‍कान।
वाह रे! जीवन, जिंदगी जीने के
कितने उसूल, कितने अंदाज
ऐ जिंदगी, अब तू ही बता जीने के ढंग
किस तरह से जिएँ जिंदगी
किस डगर की ओर चलें
किस राह पर जाकर हम
किस कोने में मशाल जलाएँ
ऐ जिंदगी, तेरी भी क्‍या लीला है
जीवन जीने के लिए कितने बँटवारे
कितने टुकड़ों में बाँट कर
दिल और दिमाग को न्‍यारा किया
उमंग-तरंगों की चाहत मिली
स्‍वांसों में लहरों की सौगात मिली
कुसुम, सुमन-सा जीवन खिला था
लेकिन गम और खुशियों में
सिमट गई दोहरी जिंदगी।
आखिर कब तक जिएँ हम
यह उधार की जिदंगी।
ऐ जिंदगी, हम भी
धीरज का आसरा लेकर
बच्‍चों की कतार बाँध
बढ़ते चले जाएंगे -
वो रंगों की टोली
जो बिखरे रंग होली के
बचे हुए रंगों की पोटली बनाकर
आकाश के ताक पर रख दी
पिछली दिपावली के
बचे हुए दीयों में डबडबाया अँधेरा
उलझन भरी इस जिंदगी में
अब उजाला जगमगाएगा
जीवन की इस रणभूमि में।

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

मैट्रो का सफर


मैट्रो का निर्माण हुआ है
देखें कितना सुधार हुआ है
बसों की भीड़ न हो पाई कम
देखों चिल्‍लम-चिल्‍ली हरदम।

मैट्रो में भी भीड़ है भारी
मचा रही कितना हड़कंप
उतरने वाले उतर न पाएं
चढ़ने वाले बल आजमाएं
किसी की देखो बटन टूट गई
बैग किसी से खींचा न जाए
चश्‍मा टूटा, घड़ी उतर गई
भीड़ है कितनी, समझ न आए।

भीड़ में देखो जेब कट गई
बटुआ खोया वो चिल्‍लाए
घुम-घुमकर शोर मचाए
जाने किसने लिया चुराए
मिलेगा कैसे कौन बताए
भीड़ बहुत है भारी-भरकम
सबकी नीयत कौन बताए
रोने से अब कुछ न मिलेगा
अपने मन को लो समझाए
चोर तो अब न पकड़ा जाए
ध्‍यान रखो खुद अपना भाई
ये तो है मेहनत की कमाई।

मैट्रो में जो भी है चढ़ता
अपनी तरह उनको समझो तुम
नारी का भी सम्‍मान करो तुम
ना बल पर अभिमान करो तुम
बड़े-बुजुर्गों का ध्‍यान रखो तुम
दो-दो मिनट पर मैट्रो है आती
मंजिल तक सबको पहुंचाती
धीरज तुम अपना क्‍यों खोते
कष्‍ट किसी को क्‍यों हो देते।
थोड़ा सा संयम बरतो तुम
सफर सरल अपना कर लो तुम।

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बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

तो सोचता हूं -


जब देखता हूं भूखे-नंगे
चिथड़ों में लिपटे बच्‍चों को
भीख मांगते हुए फटकार खाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं -
बच्चियों से बलात्‍कार करते
उनका बचपन रौंधते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं -
लड़के की चाह में
भ्रूण हत्‍या करवाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं जायदाद के लिए
भाई को भाई का खून बहाते हुए
मां-बाप को दर-बदर ठोकरें खाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं घर में बहु-बेटियों पर
लोगों को अत्‍याचार करते हुए
दहेज के लिए जिंदा जलाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं डिग्री लिए युवाओं को
नौकरी के लिए गिड़गिड़ाते हुए
अफसरों को रिश्‍वत खिलाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं
भूख से तड़पते गरीब बच्‍चों और बूढ़ों को
पार्टियों में लोगों को खाना फेंकते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

जब देखता हूं बेघर लोगों को
सड़कों की पटरियों पर सोते हुए
कई लोगों को बिल्डिंगें बनवाते हुए
तो सोचता हूं-
क्‍या आदमी की शक्‍ल का
हर आदमी इंसान होता है।

तो अब मैं पूछता हूं उन लोगों से
सिवाए अपने तुम्हें कोई इंसान नजर आता है
अब तो जागो दोस्‍तों...
इंसान खाली हाथ आया था, खाली हाथ जाता है।

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मंगलवार, 4 अक्तूबर 2016

पलभर की सांस

यह कविता उस बच्‍ची को समर्पित है, जो पैदा होते ही मृत्‍यु की गोद में समा गई।

कवियत्री : निर्मल राज

नौ महीने कोख में रखकर
दर्द से सिंचा था मैंने
एक नन्‍हीं सी पौध बनकर
उगेगी आंगन मेरे
खिलेगी शबनम की तरह
महकेगी गुल-बहार बनकर
गूँजेगी किलकारियाँ तेरी
मीठी-मीठी धुन में
चिडि़याँ गाएँगी गीत खुशी के
बस तेरे आने के इंतजार में
वो वक्‍त भी आ गया
स्‍पर्श किया माँ की गोद को
जैसे आसमान से उतरी
परियों की रानी थी तू
न मैंने जी-भर देखा
न ही जी-भर प्‍यार किया
आते ही क्‍यों रूठ गई
अग्‍नी में सिमट गईं
जल की जलपरी बन
रूलाती हुई चली गई
मखमल की तरह कोमल थी
रूई के जैसे हल्‍की-फुल्‍की
गौरी-निर्मल कंचन काया
तेरा ये राज लाड़ली-
कुछ भी समझ न आया
जीवन मिला, जुदाई हुई
एक पल में तेरी विदाई हुई
क्‍यों मेरी बच्‍ची
केवल एक सांस की खातिर
एक ही पल के लिए तूने
हमें माँ-बाप का अहसास दिया
दादा-दादी, ताऊ-ताई
नाना-नानी, मामा-मामी
सब परिवार तेरा अपना था
फिर क्‍यों डर गई जीनेे से
जो देखें हमने मिलकर सपने
सब तेरी एक सांस में सिमट गए
फिर से लौट आना मेरी लाड़ली
तेरे आने का इंतजार
पहले भी था, अब भी है, और हमेशा रहेगा...

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शनिवार, 24 सितंबर 2016

आज तो है



कवियत्री : निर्मल राज

कल ना हमारा है
ना किसी और का
कल तो सिर्फ
अपना है
जो जीता है
अपने लिए बड़ी शान से
जो आज है
जीवन का एक दिन
वो दिन हमारा है
जीयो आज
सीना तानकर
दुख की परछाई
डूब गई अपने ही भीतर
जो फैला रखा था
चहूँ ओर काला साया
बड़ी दूर तक
नहीं छोड़ा उसने
कल के इंतजार में
लेकिन कल का पता नहीं
आज तो है।

एक नई रोशनी भरी
नमी किरण मन को लूभा गई
हर्षित मन धीरे से मुस्‍कुराकर कह उठा
नन्‍हीं-नन्‍हीं टिम-टिमाती
उजली किरन नमन तुम्‍हें
जीने की चाहत की
उमंग जगा कर
भिन्‍न-भिन्‍न रंगों से सजाया वातावरण
जिन्‍दगियाँ खिल-खिल
लहरों में बहने लगी
उजड़े चमन बाग-वान हुए
जियो आज हँसी-खुशी के साथ
आज दिन हमारा है
कल किसी और का...।

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शनिवार, 17 सितंबर 2016

हिंदी बचाओ


अंग्रेजों की गुलामी से तो
देश ये आजाद हुआ
अंग्रेजी की गुलामी कर
हिंदी को गुलाम हम बना रहे।

गोरे तो चले गए
अपनी रीतियों को छोड़कर
सभ्‍यता अपनी
पाकर भी हम भुला रहे।

अंग्रेजों की अंग्रेजी
कमाल बड़ा कर रही
हम लोग हिंदी क्‍यों
हाशिए पर पहुंचा रहे।

बच्‍चे आज के
अंग्रेजी बोलने में चुस्‍त हैं
हिंदी भाषा बोलने में
वे तो शरमा रहे।

पापा को वो बोले डैड
माँ को वो बोले मोम
पापा को वो डेड देखो
माँ को नॉन लिविंग बना रहे।

हिंदी भाषा सीखने को
विदेशी यहां आ रहे
अपने ही देशवासी
हिंदी से क्‍यों कतरा रहे।

सभी अभिभावकों से विनती है यह मेरी
गुलामी की अब सभी जंजीरें तोड़ दो
खुद भी तुम हिंदी भाषा बोलो और
बच्‍चों को हिंदी भाषा का तुम ज्ञान दो।

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